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कामिनी की कामुक गाथा (भाग 51)

पिछली कड़ी में आप लोगों ने पढ़ा कि किस तरह मैं क्षितिज के लिए एक ऐसी स्त्री रेखा को फंसाया, जो अपने पति की उपेक्षा का दंश झेलती हुई वासना की अग्नि अपने अंदर दबाए हुए पत्नी धर्म का निर्वाह किए जा रही थी। मैं ने बड़ी चालाकी से उसे अपने जाल में फंसा कर उसके साथ समलैंगिक संबंध स्थापित कर लिया। इस क्रम में मैं उसके अंदर की दमित भावनाओं को उभार कर इस कदर उत्तेजित कर दिया था कि वह मुझ से बिल्कुल खुल गयी। समलिंगी संभोग के दौरान वह एक बार स्खलन सुख का अनुभव भी कर चुकी थी, लेकिन अभी वह वास्तविक कार्य बाकी था जिसके लिए मैंनें रेखा को अपने जाल में फंसाया था। अब आगे –

“आह्ह् बरसों बाद ऐसा सुख मिला। उफ्फ्फ, जादूगरनी कहीं की। काश तू मर्द होती, चुद गई होती।” वह लाज से दोहरी होती हुई बड़ी मुश्किल से बोली। “तू भी उतार न अपने कपड़े, तेरे नंगे जिस्म से प्यार कर, मैं भी तेरे जिस्म से प्यार करना चाहती हूं।” शरमाते हुए बोली वह।

“वाह मेरी लाजो रानी, ऐसे बोलोगी तो मर ही जाऊंगी मैं। चल मैं भी नंगी हो जाती हूं।” फटाफट अपने कपड़े उतार कर नंगी हो गयी मैं।

“वाऊ, गजब, तू तो पूरी कामिनी है। मुझी को खूबसूरत बता रही थी शैतान की बच्ची।” अब वह खुल गयी थी मुझ से। अच्छा ही हुआ, उसकी झिझक खत्म हुई। अब मैं उसे दुबारा गरम करना चाहती थी ताकि मौके पर चौका जड़ने के लिए क्षितिज हाजिर हो जाय। सब कुछ पूर्वनियोजित षड़यंत्र था हम मां बेटे का। नंगी हो कर पुनः लिपट गयी मैं रेखा के नंगे जिस्म से। अब रेखा भी मेरे चुंबन का उत्तर चुंबन से दे रही थी। उसके हाथ भी मेरे जिस्म पर अठखेलियाँ कर रहे थे। हमारी चूचियां आपस में टकरा रही थीं, रगड़ खा रही थीं, घर्षण से उत्पन्न उत्तेजना के मारे वह पुनः जल उठी। मैं खुद जल रही थी। हमारी योनियों का मिलन और योनि का योनि के बीच का घर्षण वासना को और भड़का रहा था। भगनासा से भगनासा का टकराव हमारी उत्तेजना की अग्नि में घी का काम कर रहा था। हम दोनों कमर चला रहे थे ऐसे, मानो औरत और मर्द के बीच संभोग हो रहा हो। एक दूजे के तन में समा जाने की असफल चेष्टा करती रहीं। एक दूसरे की चूचियों को दबोच दबोच कर लाल कल दिया था हम दोनों ने। आखिर थीं तो औरतें ही ना। कब तक, आखिर कब तक चलता यह सब।

“काश तू मर्द होती कामिनी, चुद जाती अभी ही, ओह मेरी जान।” अंततः उसके मुह से यह उद्गार निकला।

“मेरी जगह कोई और होता तब भी चुद जाती क्या?” अपनी सांसों पर काबू पाते हुए मैं बोली।

“उफ्फ्फ, तूने जैसी आग लगाई है मेरे तन में, कोई भी होता चुद जाती।” बदहवासी के आलम में बोल उठी, “कोई भी, कैसा भी मर्द, उफ”

“लौंडा, जवान, बूढ़ा, कोई भी?”

“मर्द रे मर्द कमीनी, ओह लंड वाला कोई भी मर्द साली हरामजादी, आह्ह् लौड़ा वाला, लौंडा, जवान, बूढ़ा कोई भी जो मेरी चूत की आग बुझा दे।” इतनी पागल कर चुकी थी मैं उसे कि उसे कुछ समझ नहीं आ रहाथा कि वह क्या बोल रही थी।

“फिर से सोच ले तू क्या बोल रही है।”

“सोचूं? अब भी सोचूं? चूत में आग लगी है फिर भी सोचूं? सोचने लायक छोड़ा है क्या तूने हरामजादी? समझ नहीं आ रहा है तुझे मां की लौड़ी? चुदना है चुदना, साली मां के चूत की ढक्कन। मेरी चूत में आग लगी है आग।” मेरे बालों को जकड़ कर झिंझोड़ती हुई पागलों की तरह चीखी। मैं समझ गयी लोहा गरम है, कोई भी आकर ठोक सकता है। उसके सोचने समझने की शक्ति समाप्त हो गयी है। वासना के भूख से बेहाल, बदहवासी के आलम में वह क्या प्रलाप कर रही है शायद उसका आभास भी नहीं था उसको। और लो, तभी, तभी किसी भूत की तरह अकस्मात क्षितिज दरवाजे के अंदर प्रकट हो गया। मैं जानबूझकर दरवाजा उढ़का रखी थी। दरवाजे के बाहर कान लगाकर हमारी सारी बातें सुन रहा था। उपयुक्त अवसर के इंतजार में था और लो, वह उपयुक्त अवसर आ पहुंचा था। एकाएक ऐसी स्थिति की कल्पना भी रेखा ने नहीं की थी शायद। किसी के मन की मुराद इस तरह से पूरी हो तो समझ लो आशातीत ढंग से भगवान ने दिया छप्पर फाड़ के। इक्कीस साल का छ: फुटा खूबसूरत हट्ठा कट्ठा युवक, मानो साक्षात कामदेव का अवतार बन कर प्रकट हुआ हो। हक्की बक्की रह गयी रेखा तो, तन पर चिंदी का भी नामोनिशान नहीं, मादरजात नंगी मेरे मादरजात नंगे जिस्म से चिपकी।

“यह क्या मॉम? ओह्ह्ह्ह्ह्ह आंटी? यह, यह क्या हो रहा है आप दोनों के बीच?” बनावटी आश्चर्य से आंखें फाड़े वह बोला। बनावटी ही तो था उसका आश्चर्य। उसके बरमूडा को विशाल तंबू की शक्ल में तब्दील किया हुआ उसका भीमकाय लिंग बरमूडा के अंदर कितनी देर से छटपटा रहा होगा इसे मुझसे बेहतर कौन जान सकता था भला।

“हाय राम, तू इस तरह अचानक, हमारे कमरे में?” मैं चौंकने और घबराने का नाटक करती हुई नंग धड़ंग अपने कपड़े उठाकर सीधे बाथरूम में घुस गयी। आग तो भड़का चुकी थी रेखा के अंदर कामुकता की। अब रेखा समझे और क्षितिज।

“वाऊ आंटी, गजब की खूबसूरत हैं आप तो। क्या शरीर पाया है आपने।” लार टपकाती नजरों से रेखा को नख शिख देखता हुआ क्षितिज बोला। मैं बाथरूम के अंदर से सुन रही थी सब कुछ। रेखा किंकर्तव्यविमूढ़ बिस्तर पर मादरजात नंगी, कामोत्तेजना की ज्वाला में धधकती पड़ी रही। “लगता है मैं गलत समय में आ गया।” रेखा को भौंचक्की हालत में देख कर बोला वह।

सहसा मानो नींद से जाग उठी वह, “नहीं नहीं, ठीक समय पर आये हो बेटे।” जल्दी से हड़बड़ा कर बोली रेखा, कहीं वापस न लौट जाए वह। उसका शरीर जल रहा था चुदने की चाहत में। मैं लगा चुकी थी आग और अब वह किसी से भी चुदने को मरी जा रही थी। चूत में ज्वाला धधक रही थी।

“ओह आंटी क्या बोल रही हो?”

“ठीक बोल रही हूं बेटे। ठीक समय पर आ गये तुम।”

“तो, तो क्या, तो क्या आपको मेरे इस तरह अचानक आने से वाकई बुरा नहीं लगा?”

“पागल, बुरा क्यों लगेगा? बिल्कुल सही समय पर आये हो।” वासना से ओतप्रोत आवाज थी।

“मगर आप मेरी मॉम के साथ नंगी होकर कर क्या रही थीं?” उसके नंगे जिस्म को खा जाने वाली नजरों से घूरता हुआ बोला।

“बेवकूफ, तू सचमुच जानना चाहता है कि अनजान बन कर मुझे सता रहे हो?”

“सता कहां रहा हूं?”

“देख नहीं रहे हो शैतान, सेक्स कर रहे थे।”

“औरत औरत के बीच सेक्स?”

“मर्द उपलब्ध नहीं रहे तो औरत क्या करे?”

“ओह्ह्ह्ह्ह्ह, तो मॉम क्यों भाग गयी?”

“अपने बेटे के सामने कौन मां नंगी यह सब करेगी बेवकूफ?”

“ओह, ऐसी बात है। तो अब?”

“अब क्या, तू आ गया है ना, अब जल्दी कर, और न तड़पा मुझे।” अपनी टांगें फैला कर अपनी चूत दिखाते हुए बोली। बेकरार हो रही थी चुदने के लिए।

“क्या करूं?” शैतान मजा ले रहा था।

“चोद मुझे हरामी, तब से छेड़ रहा था नादान।” खीझ उठी वह।

“कैसे?”

“ऐसे मां के लौड़े ऐसे।” खीझ कर उठी और झपट पड़ी क्षितिज पर। उसके टी शर्ट को नोच लिया रेखा ने। उसके बरमूडा को, जो इलास्टिक से कमर पर टिका हुआ था खींच कर उतार दिया झटके से रेखा ने। उत्तेजना का पारावार न था रेखा का।

हड़बड़ा ही तो गयी रेखा, जब उसका 8″ लंबा और वैसा ही मोटा लिंग फनफना कर उसके सामने उठक बैठक करने लगा। “बा्आ्आ्आ्आ्आ्आप्प्प्प्प्प् रे्ए्ए्ए्ए्ए बा्आ्आ्आ्आ्आ्आप्प्प्प्प्प्, इत्त्त्त्त््त्त्आ्आ्आ्आ्आ लंबा ््आआ््आआ््आआ और इत्त्त्त्त््त्त्आ्आ्आ्आ्आ मोटा्आ्आ््आआ।”

“क्य इत्त्त्त्ता लंबा और मोटा?”

“लंड रे लंड। तेरा लंड, गधे जैसा लंड।”

“ओह, मेरा लौड़ा? मैं तो समझता था यह नॉर्मल साईज है लंड का।”

“न न न न, तू रहने दे। मरना नहीं है मुझे। मेरी चूत फट जाएगी। तू जा बाबा जा।” सचमुच घबरा गयी थी वह।

“कभी हां कभी ना, क्या आंटी आप भी ना। साफ साफ बोलिए ना।”

“क्या बोलूं मैं। तेरे लंड ने तो डरा ही दिया।”

“आखिर करना क्या है इस लंड से जो आप इतना डर रही हैं?” हाय कितना भोला बन रहा था।

“तुझे पता नहीं है क्या किया जाता है लंड से?” ताज्जुब से बोली रेखा।

“नहीं” अनजान बनता हुआ बोला।

“हाय मेरे भोले बच्चे। चूत में लंड डालकर चोदते हैं रे, चुदाई करते हैं।”

“तो चोदने दीजिए ना।”

“फट जाएगी रे मेरी चूत शैतान।”

“आप मुझे बना रही हैं। इतने साल से चुदाई नहीं हो रही है क्या आपकी? फटी क्या?” ताज्जुब से बोला वह।

“हां फटी, पहली बार फटी।”

“फिर और नहीं चुदी क्या आप?”

“चुदी, कई बार चुदी।”

“क्यों चुदी कई बार?”

“क्योंकि एक बार चुदने के बाद मेरी चूत फट कर बड़ी हो गयी, फिर मजा आने लगा।”

“आप ही बोल रही हैं कि पहली बार फट कर बड़ी हो गयी आपकी चूत फिर मजा आने लगा, तो अभी फिर फटकर थोड़ी और बड़ी हो जाएगी न आपकी चूत, फिर मजा आने लगेगा ना।” बड़ी मासूमियत से बोला वह।

“हां शायद तुम ठीक कह रहे हो। लेकिन तेरा लंड असाधारण रूप से बड़ा है, इसलिए डर रही हूं।”

“तो ठीक है मैं जाता हूं।” मायूसी से बोला।

“हाय मेरे बच्चे, मायूस मत हो। आजा बेटा आजा, चोद ले, फटेगी चूत तो फटने दे, झेल लूंगी मैं। ऐसी आग लगा दी है तेरी मां ने कि मैं जल रही हूं। खुद तो भाग गयी बदमाश और छोड़ गयी मुझे इस जलती आग में झुलसने के लिए।” जल्दी से बोल उठी वह। डर गयी थी कि कहीं आया हुआ इतना मस्त मर्द हाथ से निकल न जाए। दिल ही दिल में खुश हो गया वह। फंस गयी चिड़िया।

“यह हुई न बात। अब आगे क्या करूं?” शरारत पर उतर आया था वह।

“टूट पड़ मां के लौड़े। मुझ पर टूट पड़ मादरचोद। अब यह भी मैं बोलूं कि अपनी बांहों में ले ले हरामी। चोद मुझे, बुझा दे मेरे तन में लगी आग।” बेहद बेकरार हो रही थी साली कुतिया।

“वाह आंटी, बहुत खूब। सोच लीजिए, फट जाएगी आपकी चूत।”

“फटने दे साले कुत्ते।” वासना की आग क्या से क्या बना देती है इन्सान को।

“बहुत दर्द होगा।”

“होने दे कमीने, दर्द होने दे।” वाह, हिम्मत की दाद देती हूं रेखा की, अंधी हो गयी पगली।

“खून निकल आएगा।”

“अबे चोदू, फटेगी मेरी चूत, दर्द होगा मुझे, खून निकलेगी मेरी, तू काहे परेशान हो रहा है। बढ़कर दबोच ले मुझे लौड़े के ढक्कन।” हां विक्षिप्त हो गयी थी अब तक वह।

“मैं कहाँ परेशान हो रहा हूं? मुझे तो आपकी चिंता हो रही है।” अपनी शरारतों से बाज नहीं आ रहा था कमीना।

“मेरी चिंता मेरी चूत में डाल साले नादान चुदक्कड़। टूट पड़ मुझ पर, अब तो मेहरबानी कर मुझ पर बेदर्दी अनाड़ी चोदू। नोच मुझे, खसोट मुझे, भंभोड़ मुझे, रगड़ मुझे, निकाल दे मेरे शरीर की इस जालिम गरमी को, बुझा दे इस धधकती ज्वाला को हरामी।” पागलों की तरह चीख रही थी, इस बात से बेपरवाह कि कोई सुन भी लेगा।

बस और क्या चाहिए था क्षितिज को। बेकरार आमंत्रण का ही तो इंतजार कर रहा था वह। टूट ही तो पड़ा किसी भूखे भेड़िए की तरह। पटक दिया उसे और चढ़ गया उसके ऊपर। दनादन चूमने लगा रेखा के चेहरे को, होंठों को, चूसने लगा होंठों को, चूमने लगा उसकी गर्दन को, उसके सीने के खूबसूरत उभारों को अपने मजबूत पंजों में भर कर बेहताशा मसलने लगा। “आआआ्आआह्ह्ह्ह् ओओ्ओओ््ओओ््हह्ह्ह्ह, उफ्फ्फ्फ” कामुकता के उस सैलाब में बहती जा रही थी जिस सैलाब के बीच मैं उसे छोड़ आई थी। जिस बर्बरतापूर्ण तरीके से क्षितिज उसकी चूचियां मसल रहा था, कोई और होती चीख चिल्ला रही होती, मगर जिस भयानक वासना की आग में वह झुलस रही थी, उसे यह बर्बरता भी आनंद प्रदान कर रहा था। वह तो भूल ही भूल गयी थी कि मैं बाथरूम में हूं। बाथरूम के दरवाजे को हल्के से खोल कर सारा नजारा देख रही थी मैं और उत्तेजना के मारे मैं खुद अपने हाथों से अपनी चूचियां मसलने लगी। अपनी चूत मसलने लगी।

“ओह माई ब्लैक डायमंड आंटी। आप बेहद खूबसूरत हो” अपनी मजबूत बांहों में दबोचे मसल डालने को तत्पर भूखे भेड़िए की तरह पिल गया था क्षितिज।

“ओह्ह्ह्ह्ह्ह आह्ह् अम्म्म्म्आ्आ्आ्आ्आ, हां हां रे चोदू बेटे, समझती हूं आह, सब समझती हूं तेरी मस्कामारी, ओह रसिया।” पिसती हुई बोली रेखा।

“मस्का नहीं आंटी, सच में।” वह उसकी चूचियों को गूंथता हुआ, उसके पेट की ओर चूमने लगा, उसकी नाभी को चाटने लगा, और फिर नीचे, और नीचे उसकी दपदपाती योनि के ऊपर लंबे लंबे घने झांट तक पहुंचा, उसे भी चाटने लगा, और नीचे उसकी फड़कती चिकनी, किसी नवयौवना की तरह कसी काली काली चूत के ऊपर ज्योंही उसके होंठों का स्पर्श हुआ, तड़प ही तो उठी वह, किसी विक्षिप्त की तरह कमर उचकाने लगी।

“उफ्फ्फ्फ मां्म्म्आ्आ्आ्आ्आ, हां हां, आह चाट मेरी चूत आह चूस ओह मेरे पागल बलमा, खा खा, खा ही जा आह रे हरामी, ओह हाय हाय” बेकरारी के वे शब्द, वासना से भरे वे शब्द, क्षितिज जैसे नये नये चुदक्कड़ को तो मानो और उत्साहित कर रहे थे। अपनी जीभ से सटासट चाटने लगा, चपाचप चूसने लगा। ऐसी चूत पहली बार देख रहा था वह। कहां मेरा भैंस जैसे चुद चुद कर फूला हुआ विशाल भोंसड़ा, और कहां रेखा की नयी नकोर कमसिन नवयौवना जैसी छोटी सी चिकनी चमचमाती चूत। काली थी तो क्या हुआ, ऐसी चूत क्षितिज की कल्पना से परे, बेहद खूबसूरत थी। अब उसे समझ आ रहा था कि नयी नयी, अलग अलग नारी, मतलब नयी नयी खूबसूरत नारी तन और खूबसूरत चूत। नया नया अनुभव और नये नये नारी तन से संभोग का नया नया स्वाद।

“उफ्फ्फ्फ आंटी, आपकी चूत तो गजब की खूबसूरत है। आह मेरी जान, इतनी मदमस्त चूत, गजब का स्वाद, चाटने में इतना स्वदिष्ट तो चोदने में कितना मजा आएगा।” पागलों की तरह चाटता हुआ बोला।

“आ्आ्आ्आ्आ्आह्ह्ह्ह मममममममेरीईईईईईईई मां्म्म्आ्आ्आ्आ्आ मैं गय्य्य्य्ई्ई्ई्ई रे गयी।” थरथराती हुई दूसरी बार झड़ने लगी “इस्स्स्स्स्स्स्स्स्…….” यह उसके अनिर्वचनीय सुख की अभिव्यक्ति थी। निढाल होते हुए उसके तन को छोड़ा नहीं क्षितिज ने और कुत्ते की चाटता हुआ उसके योनि रस को हलक से उतारता चला गया।

“वाह आंटी, वाह, गजब का स्वाद।” उसकी चूचियों को छोड़ कर क्षितिज ने उसके गोल गोल नितंबों को पूरी शक्ति से दबोच कर चाटते हुए प्रशंसात्मक लफ्जों में बोला। लेकिन असली खेल तो अभी बाकी था। रेखा की न जाने कितने सालों से अनचुदी चूत की धज्जियां उड़ने वाला खेल।

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