कामिनी की कामुक गाथा (भाग 67)

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पिछली कड़ी में आपलोगों ने पढ़ा कि रामलाल अपने सेक्स जीवन की उत्तेजक घटनाओं से किस तरह हमें अवगत करा रहा था। हम सब, हरिया, करीम, मैं और रश्मि, बड़ी तन्मयता के साथ उसकी कथा सुनने में मशगूल थे। सरोज और रबिया वाली घटना से रूबरू होते होते हम इतने उत्तेजित हो उठे थे कि खुद को रोक नहीं पाए और एक और दौर कामुकता के गंदे खेल का चल गया। चूंकि रबिया वाली कथा का अंत गुदा मैथुन से हुआ, अत: यह वासना का खेल हमारे बीच गुदा मैथुन का ही खेला गया। रामलाल से चिपकी रश्मि को रामलाल नें उसके लाख इनकार के बावजूद पलट कर एक तरह से बलात्कारी की तरह अपनी हवस का शिकार बना डाला। रश्मि चीखती चिल्लाती रह गयी, किंतु रामलाल जैसे ताकतवर हैवान के चंगुल मेंं बेबस पंछी की तरह फड़फड़ाती हुई बन ही गयी उस की शिकार। रामलाल किसी वहशी दरिंदे की तरह अपने अविश्वसनीय, अमानवीय, विकराल लिंग से उसकी संकीर्ण गुदा मार्ग को क्षत विक्षत करते हुए अपनी मनमानी करने में सफल हो गया। गाड़ दिया अपनी सफलता का झंडा और करीब आधे घंटे तक नोचते भंभोड़ते कूटता रहा उसकी गुदा को। रश्मि जो आरंभ में पीड़ा से मरी जा रही थी, अंततः, उस कामुक भेड़िए की दरिंदगी को झेल पाने में समर्थ हो गयी और आनंद मुदित अपने नितंबों को उछाल उछाल कर हम सबके सम्मुख यह जाहिर करने में खुद को रोक नहीं पाई कि उसे रामलाल के विकराल लिंग द्वारा संभोग में अनिर्वचनीय सुख प्राप्त हो रहा है। इधर मुझ पर भी कम कहर नहीं ढाया इन दो बूढ़ों ने। हरिया और करीम नें मेरी गुदा को ही अपना निशाना बनाया। दोनों ने मुझे दबोच कर एक साथ, अपने लिंगों से मेरी एकमात्र गुदा पर हमला बोला। उफ्फ्फ्फ्फ्फ, एक नहीं, दो दो लिंग जब मेरी एकमात्र गुदा की संकीर्ण गुफा में समाने की जद्दोजहद कर रहे थे तो प्रारंभ में मैं भी विचलित हो उठी थी। लेकिन मैं ने खुद को समझाया कि जब दो दो लिंगों को अपनी एकमात्र योनि में समाहित कर आनंद ले सकती हूं तो फिर गुदा में लेने में क्या भय। दांत भींचकर मैं भी सफलतापूर्वक झेल गयी उस पीड़ामय पलों को और नतीजा? वही सुखद अहसास। मजे से गुदा मैथुन का आनंद लेती रही। जब यह दौर समाप्त हुआ, हम सब थक कर चूर हो चुके थे। किसी प्रकार लड़खड़ाते हूए मैं उठी और बाथरूम की ओर बढ़ी। मल और वीर्य का मिश्रित द्रव्य मेरी गुदाद्वार से होते हुए मेरी जांघों पर बह निकला था। खैर जब मैं बाथरूम से फ्रेश होकर आई तो देखा, सब वैसे के वैसे पड़े हुए थे।

“अरे ऐसे ही पड़े रहोगे कि उठोगे भी? आगे की कहानी सुननी नहीं है क्या?” मैं उन्हें संबोधित कर बोली।

“देख नहीं रही मां की लौड़ी, क्या हालत है?” रश्मि अलसाई सी बोली।

“देख रही हूं साली कुतिया, देख रही हूं। देख रही हूं तेरी गांड़ का गूदा निकल गया है। तेरी गांड़ से गू निकल गया हरामजादी, उठ और जा कर धो धा कर आ जा।” बड़े बेमन से रश्मि भी लड़खड़ाती हुई उठी और बाथरूम में घुस गयी। बाथरूम का दरवाजा भी बंद नहीं की और टायलेट पर बैठ गयी। भर्र भर्र करके उसने अपना पेट पूरा खाली कर दिया, उसकी गांड़ खुल जो गयी थी। मैं मुस्कुरा उठी। “क्यों री, गांड़ का फाटक पूरी खुल गयी है क्या?”

“साली रंडी, तू तो चुप ही रह। तेरे ही चक्कर में गांड़ फड़वा बैठी।” अंदर से ही रश्मि की आवाज आई। जब वह वापस आई तो बड़े प्यार से रामलाल को उठाने लगी, “उठिए मेरे रसिया, चलिए आपका लंड धो दूं।” अनिच्छा से रामलाल उठा और रश्मि के साथ बाथरूम चला।

“अबे ओ मादरचोदों, आपलोगों को अलग से बोलना पड़ेगा क्या? उठिए और जाकर लंड धोकर आईए।” मैं डांटती हुई हरिया और करीम से बोली। जब सभी फ्रेश हो कर बैठक में आए तो, मैंने ही कहा, “रामलाल जी, चलिए, अब आगे की कहानी, शहला वाली शुरू कीजिए।” रामलाल से अब भी चिपक कर बैठी थी रश्मि। हम सब अब भी बेशरमी के साथ नंगे ही अपने अपने स्थान में बैठे थे। मैं हरिया और करीम के मध्य सैंडविच बनी बैठी थी।

“ठीक है, अब आगे सुनिए : –

“उस दिन दोपहर को खाना खाने के बाद मेरा लंड बार बार खड़ा हुआ जा रहा था। मैं सरोज को चोदना चाह रहा था लेकिन वह चोदने नहीं दे रही थी।

“नहीं जेठ जी, अभी नहीं। बहुत काम है। पूरा बर्तन धोना है। अभी नहीं।”

“लेकिन मैं इस लंड का क्या करूं? खड़े खड़े दर्द कर रहा है।”

“तो जाईए न रबिया को चोद लीजिए।”

“ठीक है, यह भी ठीक है।” कहते हुए मैं खड़े लंड, रबिया के घर चला गया। दरवाजा बंद था उसका। “रबिया बहन, दरवाजा खोलो।” मैं बोला। लगता है उसे भी चुदने की पड़ी थी। तुरंत दरवाजा खुला और मैंने दरवाजे पर ही रबिया को पकड़ लिया।

“अरे अरे, दरवाजा तो बंद कर लूं।” रबिया बोली।

“छोड़ो छोड़ो, मैं बंद कर देता हूं।” कहकर मैंने दरवाजा बंद दिया और उसे उठा कर बिस्तर पर ले गया। पैजामा खोल फेंका, रबिया को बिस्तर पर पटक कर चढ़ बैठा उस पर। बिना किसी भूमिका के उसकी साड़ी उठा दी। अंदर कुछ पहनती तो थी नहीं, मैं भी अंदर कुछ पहना नहीं था। चोदना चाह रहा था सरोज को, अंडरपैंट घर में ही खोल चुका था, जल्दबाजी में वैसे ही आ गया था रबिया के घर। पीछे से कुतिया के माफिक अपना लंड घुसेड़ दिया उसकी चूत में और दनादन चोदने लगा। उसकी थलथल करती बड़ी बड़ी चूचियों को पीछे से दबोच कर चोदने में बड़ा मजा आ रहा था। रबिया भी मस्ती में डूबी चुदने में मगन थी। हम दोनों बड़े मजे में चुदाई में डूबे हुए थे कि अचानक हमें दरवाजे मेें दस्तक सुनाई पड़ी और उसी के साथ उसकी बेटी शहला की आवाज भी। इस असमय शहला के आगमन से हम दोनों झुुंझला उठे थेे। शायद आज कॉलेज की छुट्टी जल्दी हो गयी थी। रबिया हड़बड़ा कर मेरी पकड़ से छूट कर अपने को संंभालते हुए मुझे अलमारी के पीछे छुपाकर दरवाजा खोलने चली गयी। मैं नंगा ही अलमारी के पीछे छुपा रह गया था।

शहला घर में घुस कर सीधे सोने के कमरे में चली आई और धम्म से बिस्तर पर बैठ गयी। बिस्तर पर बैठते ही उसकी नजर मेरे कपड़ों पर पड़ी, जिसपर हड़बड़ी में न मैंने ध्यान दिया न ही रबिया नें।

“अम्मी, ये किसके कपड़े हैं?” शहला का सवाल था।

“यह यह यह ……” रबिया के मुंह से आगे बोल नहीं फूटा। शशंकित शहला इधर उधर देखने लगी।

“बताओ अम्मी।”

उसे चुप देख कर मैं खुद बाहर निकल आया, “मेरे कपड़े हैं।” मेरी आवाज सुनकर मेरी ओर मुड़ी और मुझे नंग धड़ंग अवस्था में देखकर उसकी आंखें फटी की फटी रह गयी। इतनी देर में मेरा लंड आधा मुरझा चुका था। कभी ऊपर देखती, कभी नीचे।

“अ अ अ अंकल आ्आ्आ्आप?” उसके मुंह से निकला।

“हां मैं।” मैं अब उसके सामने आ चुका था। शहला अठारह साल की गदराए बदन की लड़की थी। अच्छी सेहतमंद, खूबसूरत, लड़की, चूचियां संतरे जैसी। मेरे लिए तो बस चोदने के लिए एक औरत थी, वह भी इतनी खूबसूरत जवान औरत। मेरा मुरझाया लंड फिर से टाईट होने लगा।

“अअअअअआप इस तरह हमारे घर में?” शहला की घबराई आवाज आई। वह सबकुछ समझ गयी थी। उसकी मां के चुप रहने से उसका शक पक्का हो गया था कि यहां क्या चल रहा था।

“हां, तो?” चोदने की तीव्र इच्छा हो रही थी। शहला नें बीच चुदाई में बाधा जो डाल दी थी। अधूरी चुदाई पूरी करने के लिए पागल हुआ जा रहा था। रबिया चाहे शहला, चूत तो चूत होती है। मुझे कहाँ कुछ पता था कि एक कुवांरी लड़की और एक चुदी चुदाई औरत को चोदने में फर्क क्या है। मैं सोच ही रहा था कि शहला चीख उठी, “गंदे, जंगली, सूअर के बच्चे, बेशरम।”

“चुप रह शहला।” अब भयभीत रबिया बोली।

“क्यों रहूं चुप?”

“अगल बगल के लोगों को पता चल जाएगा।”

“लगने दो पता।”

“बदनाम हो जाएंगे हम।”

“तुमने काम ही ऐसा किया है।”

“माफ कर दे हमें बेटी।” गिड़गिड़ाने लगी रबिया।

“क्यों करूं माफ, गंदी।” शहला का गुस्सा शांत ही नहीं हो रहा था। खड़ी हो गयी वह, और बाहर जाने लगी। तभी रबिया उसका रास्ता रोक कर खड़ी हो गयी।

“मान भी जाओ ना।”

“नहीं, सबको बता कर रहूंगी, क्या चल रहा है यहां।”

“तो तू नहीं मानेगी?” अब रबिया तनिक गुस्से में बोली।

“नहीं।”

“रामलाल भईया, पकड़िए इस लड़की को।” अब वह तैश में आ गयी थी। मैं ने तुरंत शहला को पीछे से अपनी बांहों में जकड़ लिया।

“छोड़िए मुझे, वरना मैं चिल्लाऊंगी।” शहला छटपटाती हुई बोली। उसके छटपटाने से मेरा लंड, जो अब खड़ा हो चुका था, शहला के सलवार समेत उसकी गांड़ में घुसा चला जा रहा था। बड़ी मस्त, सुंदर, जवान, भरी पूरी, गदराए शरीर की मालकिन शहला की चूचियों का स्पर्ष जब मेरे हाथों से हुआ, उफ्फ्फ्फ्फ्फ, संतरे जैसी चूचियां, वह भी सख्त, मेरा लंड तो फनफना कर उसकी सलवार को फाड़ डालने के कागार पर पहुंच गया।

“मुंह बंद कीजिए इसकी।” रबिया फुंफकार उठी। मैंने एक हाथ से उसका मुंह बंद कर दिया।

“अब?” मैं सवालिया निगाहों से रबिया को देखा।

“अब क्या? चोद डालिए इसे भी। न किसी को मुंह दिखाने के काबिल रहेगी, न ही किसी को बताएगी।” रबिया ने बिना आगा पीछा सोचे कहा।

मुझे और क्या चाहिए था। इतनी देर से चोदने को मरा जा रहा था। उसका मुंह दबाए हुए खींच कर बिस्तर पर लाया और उसके सलवार का नाड़ा खोलने लगा। नहीं खुल रहा था तो एक झटके से तोड़ दिया नाड़ा और खींच लिया नीचे। शहला बड़ी जोर लगा रही थी मुझसे छूटने के लिए लेकिन मुझसे छूटना इतना आसान थोड़ी था। रबिया अबतक एक कपड़े का टुकड़ा ले आई थी और उससे शहला के मुंह को बांध दिया, ताकि वह चीख चिल्ला नहीं सके। रबिया यहीं नहीं रुकी, उसने शहला के कमीज को भी खींच कर उतार दिया और उसके चूचकसना को भी। इधर मैं उसके सलवार और चड्ढी को खोल चुका था। उफ्फ्फ्फ्फ्फ, इतनी मस्त जवान लड़की के नंगे बदन को मैं पहली बार देख रहा था। संतरे जैसी चूचियां। संगमरमर जैसा चिकना बदन। केले के थंभों जैसे उसकी जांघें। मक्खन जैसी उसकी चूत इतनी चिकनी कि मुंह में पानी भर आया। चूत के ठीक ऊपर हल्के रोयेंंदार बाल उगे हुए थे। मैं उसपर चढ़ गया और उसके पैरों को फैला कर उसकी जांघों के बीच घुस कर उसे बेबस कर दिया। उधर रबिया उसके दोनों हाथों को पकड़ कर विरोध करने से लाचार कर चुकी थी। शहला की आंखों से आंसू बह रहे थे। मुंह से गों गों की आवाज निकल रही थी। सर इधर उधर पटक रही थी लेकिन कुछ भी करने से लाचार थी। मैं बिना और कुछ सोचे अपने लंड का सुपाड़ा उसकी चिकनी चूत के फांक पर रखा और अपने शरीर का भार देने लगा। शहला की आंखें फटी जा रही थीं और इधर साथ ही उसकी चूत भी। घुस ही नहीं रहा था मेरा लंड, इतनी टाईट थी उसकी चूत।

“तेल लगा अपने लंड पर साले चुदक्कड़ मियां, चूत देखी नहीं कि सीधे लंड ससेटने को पागल हुए जा रहे हैं।” रबिया मेरी परेशानी, शहला की पीड़ा से विकृत होते चेहरे और छटपटाहट को भांप कर बोली।

“तो ला ना तेल की शीशी साली बुरचोदी, खड़ी खड़ी काहे मां चुदा रही है मां की चूत।” झल्लाहट में मेरे मुंह से निकला। यह सब गालियां मैंने उन्हीं लोगों से सीखी थी।

“मैं इसके हाथ पकड़ी हूं, छोड़ कैसे दूं मादरचोद?”

“हाथ ही न पकड़ी है लंड की ढक्कन, छोड़ इसे, मैं संभालता हूं इस कुतिया को।” उसने भागकर तेल की शीशी मेरे हाथ में थमाई और मैं अपने लंड पर तेल चुपड़ा, उसकी चूत पर तेल चुपड़ा और आ गया फिर से मैदान में। अहा, अब घुस रहा था, धीरे धीरे, उसकी चूत को फाड़ता हुआ, उफ्फ्फ्फ्फ्फ, फिर भी टाईट थी, मगर घुस रहा था धीरे धीरे। शहला की हालत खराब थी, पैर पटक रही थी, सिर पटक रही थी, रो रही थी, गों गों की आवाज उसके नाक से निकल रही थी। आंखें फटी जा रही थी, मगर अब मैं कहां रुकने वाला था, मेरे लौड़े का अगला भाग घुस चुका था उसकी चूत में और घुसता ही चला जा रहा था। मैं रुका नहीं, ठूंसता गया, ठूंसता गया। शहला तड़प रही थी और अचानक उसका तड़पना रुक गया। शांत हो गयी वह। उसका शरीर ढीला पड़ गया। आंखें बंद हो गयीं। अबतक आधा से ज्यादा लंड घुस चुका था उसकी चूत में। उसकी हालत देखकर मुझे तो कोई फर्क नहीं पड़ा लेकिन रबिया डर गयी।

“रुकिए भाई साहब, लगता है यह बेहोश हो गयी है।”

“साली हरामजादी को अभी ही बेहोश होना था।” मैं भन्ना कर रुका। रबिया तुरंत पानी ले कर आई और शहला के चेहरे पर पानी के छींटे मारने लगी। कुछ ही पलों में शहला को होश आ गया, इससे पहले कि उसे पूरी तरह होश आता, मैंने लंड घुसाना जारी रखा। उसके पूरी तरह होश आते आते मैं पूरा लंड घुसा चुका था। किला फतह कर चुका था लेकिन शहला अब फिर दर्द के मारे हाथ पैर पटकने लगी। मैंने शहला के चूतड़ के नीचे हाथ लगाया कि अब चोदना शुरु करूँ लेकिन मेरा हाथ गीला हो गया। क्या पेशाब था शहला का? हाथ देखा तो खून से लतपत। खून देखकर मेरे होश उड़ गये।

“यह क्या? खून?”

“हो गया, काम हो गया, शहला के चूत की झिल्ली फट गयी। खून निकलता है, पहली बार खून ऐसे ही निकलता है। शाबाश रामलाल जी, आपने किला फतह कर लिया। शहला को भी होश आ गया। अब चोदिए जी चुदक्कड़ बादशाह। जहांपनाह, अब सब ठीक है।” रबिया चहक उठी। अब तो मेरी खुशी का ठिकाना न रहा। शुरू हो गया। चूतड़ के नीचे हाथ डालकर गचागच चोदने लगा। उसकी सख्त चूचियों को दबाने लगा, चूसने लगा, जोश में उसकी चूचियों पर दांत भी गड़ा बैठा। करीब दस मिनट बाद तो चकित हो गया। शहला की कमर भी चल रही थी। पता नहीं, जानबूझकर या अनजाने में उसकी कमर अपने आप ऊपर की ओर उछल रही थी। अब उसकी आंखों से आंसू नहीं निकल रहे थे। उसकी आंखें बंद थीं। उसके चेहरे पर अब पीड़ा नहीं दिख रही थी। रबिया नें शहला के दोनों हाथों को कब का छोड़ दिया था। शहला के दोनों हाथ अब मेरी कमर पर आ कर कस गये थे। रबिया नें जब शहला की यह हालत देखी तो उसके मुंह पर बंधा कपड़ा खोल बैठी। कपड़ा खुलते ही, “आ्आ्आ्आ्आह, ओ्ओ्ओह्ह्ह, इस्स्स्स्स्स्स्स इस्स्स्स्स्स्स्स” की आवाजें निकलने लगीं शहला के मुंह से। मैं समझ गया कि अब शहला को चुदने में मजा आ रहा है। मैं बड़ा खुश हुआ और दुगुने जोश से उसके नंगे बदन को मसलते हुए भच्च भच्च चोदने में लग गया।

“ओह्ह्ह्ह्ह ओह्ह्ह्ह्ह, अब आ रहा है न मजा?”

“आह्ह आह हां ओह ओह्ह्ह्ह्ह हां उफ्फ्फ्फ्फ्फ।” सर हिलाते हुए बोली शहला। उसने अपने पैरों को मेरी कमर पर चढ़ा कर जकड़ रखा था।

“ले, ओह ले मेरा लंड, ओह खा मेरा लौड़ा अपनी चूत में, अहा, इतनी मस्तानी चूत है तेरी, उफ्फ्फ्फ्फ्फ मेरी रानी बिटिया, आज से पहले ऐसी चूत नसीब नहीं हुई थी। आह्ह।” मैं बोले जा रहा था और चोदे जा रहा था।

“साली रंडी, अब बताएगी किसीको?” रबिया वहीं खड़ी हमारी चुदाई देखते हुए बोली।

“हांआंआंआंआंआं, आह्ह आह्ह हांआंआंआंआंआं।” शहला बोली।

“हरामजादी कुतिया, अब भी बोलेगी?”

“हां हांआंआंआंआंआं, बोलूंगी, अगर अंकल मुझे नहींईंईंईंईंईंईंई चोदेंगे तो बोलूंगी्ई्ई्ई्ई्ई।” शहला आनंदमुदित चुदते हुए बोली।

“हा हा हा हा तो ये बात है।” रबिया खुश हो गयी। करीब पंद्रह मिनट बाद शहला चिपक गयी मुझ से और, “ओह्ह्ह्ह्ह रज्ज्ज्ज्जा्आ्आ्आ्आ, आ्आ्आ्आ्आह,” कहते हुए खल्लास हो कर निपट गयी लेकिन मैं ने छोड़ा नहीं उसे और उसके ढीले पड़ते शरीर को रौंदता रहा, चोदता रहा। जीवन में ऐसा आनंद पहली बार मुझे मिल रहा था। करीब चालीस मिनट तक हमारे बीच यह चोदा चोदी का खेल चलता रहा। पता नहीं क्यों मेरे लंड से पानी निकलने का नाम ही नहीं ले रहा था। इस बीच वह दो बार झड़ चुकी थी। खैर आखिर में मेरे लंड ने पानी छोड़ना शुरू किया, बाप रे बाप, करीब दो मिनट तक मेरे लंड से पानी निकलता रहा निकलता रहा। ऐसा लग रहा था जैसे शहला की चूत मेरे लंड का एक एक बूंद रस चूस कर रहेगी। उफ्फ्फ्फ्फ्फ ओ्ओफ्फ्फ्फ्फ्फ। बड़ा मजा आया उस दिन, पहली ही बार में एक कुवांरी लड़की की सील भी तोड़ी और दीवानी भी बना लिया। खुन्नम खून चूत और लंड। लेकिन चिंता कुछ नहीं। थक कर चूर, आनंद से आंखें बंद किए हुए मुझसे चिपटी ही रही काफी देर तक।

“आ्आ्आ्आह, मजा आ गया तुम्हें चोदकर। कैसा लगा तुम्हें?” मैं उसे अपनी बांहों में कसे हुए ही पूछा।

“हाय्य्य्य्य अल्ल्ल्ल्आ्आ्आ्आ्ह्ह्ह, अंकल, उफ्फ्फ्फ्फ्फ, मा्आ्आ्आ्आर ही डा्आ्आ्आ्आला्आ्आ् था मुझे तो। एक बार तो लगा था कि मर ही जा रही हूं मैं।”

“मरी तो नहीं ना।” शरारत से बोला मैं।

“हाय दैया, जुल्मी कहीं के।” मेरे सीने पर सर रख कर बोली।

“बस बस, हो गया। चल उठ अब। बड़ी प्यार दिखा रही है चुदने के बाद अब।” रबिया बोली।

“नहीं, नहीं उठुंगी।” शहला मुझसे चिपकती हुई बोली।

“हरामजादी, उठती है कि नहीं। खून से लिथड़ कर भी मन नहीं भरा?”

“नहीं भरा, मन नहीं भरा।”

“साली कुतिया, अपनी अम्मी के सामने ऐसा बोलती है रांड।”

“अम्मी? काहे की अम्मी? खुद आपने ही तो चुदवाया मुझे ना? अब बड़ी आयी अम्मी बनकर।” उनकी बातें सुनकर मुझे बड़ा मजा आ रहा था। उस दिन पता नहीं मेरे लंड को क्या हो गया था, इतनी देर में ही फिर टनटना कर खड़ा हो गया। फिर वही चुदास जाग गयी मेरे अंदर। चूंकि मेरा लंड शहला की चूत से बाहर निकल चुका था, जैसे ही रबिया की नजर मेरे लंड पर पड़ी, उतावली हो गयी चुदवाने के लिए। हमारी चुदाई के दौरान ही वह पूरी नंगी हो चुकी थी। अपनी भरी पूरी मांसल मां को ऐसी बेहयाई से नंगी देखने की शायद उसने कल्पना भी नहीं की थी।

“रंडी, बेहया कुतिया।” उसके मुंह से निकला।

“चल हट, बेहया तू, बेहया तेरी चूत, बेहया तेरा भोंसड़ा।” उसने शहला को खींच कर मुझसे अलग कर दिया। शहला की नजर अब मेरे टनटनाए लंड पर पड़ी तो एकाएक विश्वास ही नहीं हुआ उसे कि यही लंड उसकी चूत में घुसा था।

“बा्आ्आ्आ्आप रे्ए्ए्ए्ए्ए बा्आ्आ्आ्आप, एक फुट का बेलन मेरी बुर में घुसा था! उफ्फ्फ्फ्फ्फ।” किसी प्रकार उठी लड़खड़ाते हुए और आंखें फाड़े खून से सने मेरे लंड को देखती रह गयी।

“तू देखती रह मां की लौड़ी, अब मेरी बारी है, ख्वामख्वाह हमारे बीच में कूदी थी।” कहते कहते मुझ पर चढ़ गयी और मेरे लंड को गप्प से अपनी चूत में ले कर अपनी बेटी के सामने ही गपागप चुदवाने लगी। उस दिन उन दोनों मां बेटी को जी भर के चोदा। उस दिन के बाद मुझे तो जैसे शहला को चोदने का लाईसेंस मिल गया। जब मर्जी शहला को चोदता, जब मर्जी रबिया को चोदता और जब मर्जी सरोज को चोदता। इतना कहकर वह चुप हुआ।

“वाह जी वाह, चांदी हो गयी आपकी तो। उधर तीन, इधर दो, कुल पांच चूत का स्वाद चख लिया आपने तो।” मैं बोली।

“सिर्फ चूत का नहीं, गांड़ का भी।”

“ओके बाबा चूत और गांड़, पांच पांच चूत और गांड़।” मैं बोली। उसकी कहानी खत्म होते ही हम फिर एक दूसरे पर पिल पड़े। फर्क सिर्फ इतना था कि जो हालत रामलाल नें रश्मि की की थी, वही हालत अब वह मेरी कर रहा था ओर हरिया और करीम रश्मि के जिस्म को नोचने खसोटने लगे थे। यह सब करते करते कब शाम हो गयी हमें पता ही नहीं चला। थक कर चूर यहां वहां बेहद गंदे तरीके पड़े लंबी लंबी सांसें ले रहे थे।

आगे की कथा अगली कड़ी में। तबतक के लिए कामुकता की चाशनी में डूबी अपनी लेखनी को विश्राम देने हेतु आज्ञा चाहती हूं।

कामाग्नि में झुलसती

रजनी

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