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मुर्गी हलाल – Dirty Sex Tales

”भोमचक भोमचक ले लो मज़ा, कुचीपुड़ी कुचीपुड़ी छोरी सजा ”– उस बड़ेवाले  कमरे में एक पुष्ट तबीयत छोकरी नाच रही थी। रंग बिरंगी रोशनी झकास मार रही थी। भभकता हुआ संगीत पछाड़ें लगा  रहा था॥ ”चोखी छोरी, कच्ची शराब :: माल मलाला लब-लब-लबाब ”<>

कुल पाँच पुरुष थे, सबके हाथों में दारू की बोतल और सबके बदन कसे हुए, हालांकि उनकी उम्र कुछ ज्यादा ही बड़ी थी। 45-49 के बीच के कठोर और दुष्ट मर्द थे; ऐसे जिनके लिए मारपीट तो बच्चों का खेल था, ये कमबख्त तो हत्या भी कर सकते  थे क्योंकि  सभी पांचों क्रिमिनल और आदतन अपराधी थे। इनकी कमाई का जरिया लूटपाट, जबरन वसूली और ब्लैकमेलिंग था। दो  पर तो बलात्कार  के केस भी चल रहे थे, लेकिन उन्हें परवाह नहीं थी; ऐसे सभी मामलों में वे हमेशा बरी होते आए हैं।पांचों में एक समानता थी, पांचों को कमसिन और मासूम लड़कियों को खराब कर रौंदने की आदत थी और इनके हुनर अनोखे थे। सबकी टांगें, जांघें, पेट, छाती और माथा मोटा था। दो की टाट गंजी थी और रंग काला-स्याह, अफ्रीकी हब्शी-जैसा। एक की बहुत भारी भरकम दाढ़ी थी  और आँखें चमक रही थी। डरावने थे मगर नंगे सेक्स के शातिर  खिलाड़ी ।

इन पाँच को ताज़ा मज़ा लेने-देने के लिए दो या तीन लेडी जात  इनकी सेवा में तनी हुई  रहती थी, ये अक्सर 38-40 वर्ष की छँटी हुई चालू औरतें होती थीं  और अपने साथ कम से कम एक 22-23 की कॉलेज छोकरी जरूर रखती थी। इनको भी नमकीन और कंवारी छोरी की तलब रहती थी।

पांचों में जो मुखिया था, मुख्य खिलाड़ी , उसका नाम जालिमसिंह था। यह रावणा राजपूत था, इसकी काली झकास बड़ी और सघन मूंछें थी, पर दाढ़ी नहीं थी। यह उम्र में भी सबसे बड़ा था, 49 वर्ष, पर खाने-पीने लड़ने-भिड़ने और मौज़-मज़ावल में जवान पट्ठे को मात करता था। दूसरा था रक्तसिंह भाटी, 47 वर्ष — इनका देशी और बिलायती दारू का ठेका मशहूर था। तीसरा था मोटाराम जाट, 45 वर्ष।बाकी दो पठानकोट के पठान मुसलमान थे: अजीरुद्दीन खान और नजीरुद्दीन खान।

आज के खेल के लिए रक्तसिंह भाटी ने जेठीबाई को तलब किया। 40 वर्ष की धुर- जवान जेठीबाई भी खिलाड़ी थी। वह ताज़ा, लज़ीज़ और कमसिन माल परखना , पटाना और परोसना जानती थी। फिर चंपाबाई भी थी; और कॉलेज कन्या संजना ( 22 वर्ष )— इस तिकड़ी पर पांचों को न केवल बिश्वास था बल्कि फ़क्र भी था, गर्व था।

रक्तसिंह भाटी ने इन दो से पूछा — ”माल तैयार है??” जवाब बहुत फुर्ती और सुहाने -मीठे अंदाज़ में मिला– ‘हाँ, हजूर, एकदम निखालिश और ताज़ा दम माल है, शुद्ध 16 साल की कश्मीर की कली है, केशर में नहाई हुई और फूलों के शबाब से तर, लाल-सेब से गाल और गदराया जिस्म और जान। दो लायी हूँ, हजूर; दूसरी नई शादीशुदा है,अभी शादी को 15 दिन ही हुए हैं,और समझदार है, हजूर!’ मोटाराम जाट बोला– कच्ची कली को हम बाद में रगड़ेंगे, पहले इस नई ब्याहता का मांस चखेंगे, साली की –**** जालिमसिंह ने कहा — चम्पा, तुझे हमारा हरामीपना तो पता है ना! जब तक हम दंड न दें, हमारा लंड खड़ा ही नहीं होता।कॉलेज छोकरी  संजना बी.ए.नई थी, उससे रक्तसिंह बोला — ‘देख, सामने देख, हमारे ताड़न-मारन के हथियार!’

सामने की खुली आलमारी में कई तरह के अस्त्र-शस्त्र थे,चमड़े का कौड़ा ( हंटर ) था, लोहे का डंडा था, मुंह और हाथ-पैर बांधने की काली रस्सियाँ थीं, नुकीली सुइयां भी, और मुंह दबोचने के औज़ार । दाढ़ीजार अजीरुद्दीन और नजीरुद्दीन तो हर चुदाई की छोकरी के मस्त मम्मों को मोटे रस्सों में खींच-दबा के ही बिस्मिल्लाह करते थे।संजना रानी ये औज़ार पहली बार देख रही थी।

संगीत की धुन और तेज हो गई थी, वह पुष्ट तबीयत लड़की मटक-मटक कर जहरीला नागिन डांस नाच रही थी, हवा में एक घृणित मादक गंध भी तैर रही थी; पांचों मर्दों ने पहले भर पेट मांस-मीट-मछली -कबाब पेट में चटखाया और फिर बोतल से मुंह में दारू उंडेल-उंडेल पी ली , छक कर; जेठीबाई और चंपाबाई ने भी दारू गटकाई। कॉलेज कन्या संजना मुग्ध थी । अचानक तबले के बोल  का ज़ोर का धमाका हुआ ” धाकिट तकिट-तकाकिट धूमकिट तकिट तकाकिट  तटिकट-गदिघन धा, धा, धा ”[email protected]#?****

सामने देखा तो जेठीबाई और चंपाबाई नववधू के शृंगार में लजी-सजी एक 17 वर्ष की चिड़िया को सिर और टांगों के बल घसीटते हुए ला रही थी, संजना पुलिस की ड्रेस में डंडा फेंट रही थी और नई छोकरी पर दाँत चबा रही थी। इस गुलगुली चिड़िया का नाम मधुप्रिया था, ओह, गुड!

पांचों महापुरुष बेहद अश्लीलता और घिनौनेपन के साथ चटकारा ले रहे थे, उनके मुख से लार टपक रही थी। चंपाबाई ने इस चिड़िया को सीधे जालिमसिंह और  रक्तसिंह की टांगों के बीच ला पटका।दोनों खड़े थे, लूँगी में थे, दोनों ने अपनी टांगें चौड़ी कर रखी थी , और सबसे बड़ी बात वे दोनों लूँगी के भीतर एकदम नंगे थे, उनका लौड़ा खड़ा था, वाह! बाकी तीनों का काम था की वे उस नव ब्याहता बाला के कपड़े तार-तार कर खींचें और इस रंगीन चिड़िया को अधनंगी करे। जालिमसिंह  इस कन्या के गालों पर झपट्टा मार उसे मुट्ठी में मसोस कर मसलने और रगड़ने लगा। वह बार- बार अपना थूक से भरा मुंह उसके गालों से चिपका कर स्वाद ले रहा था जबकि रक्तसिंह उस लड़की की प्यारी-प्यारी गांड को नंगी-नुच करने में लगा था। संजना भी उस कबूतरी को चटाक -चटाक पीट रही थी। फिर अजीरुद्दीन और नजीरुद्दीन ने उसे पूरी मादरजात नंगी कर डाला। धमक धम, धमक धम, धम-धम करते हुए अब सब उस पर पिल पड़े; कन्या के माथे का सुहाग-सिंदूर उखड़ गया था और अब उसकी अस्मत को लूटते हुए कुत्सित मज़ा लेने की ट्रेन खुल गई थी। आगे से जालिमसिंह और पीछे से रक्तसिंह उस कन्या के शरीर से बुरी तरह से चिपक गए थे।दो मर्द अगल-बगल उसके मम्मे नोंच रहे थे, एक उसके मुंह से मुंह भिड़ा उसमें शराब के कुल्ले कर रहा था। मधुप्रिया लाज-शरम के मारे छुपा-चुप थी, वैसे भी वो इन ज़ालिमों के सामने क्या कर सकती थी, सोचो!

कॉलेज कन्या संजना इन मर्दों के मोटे और कठोर लंड निरख कर हैरान थी — किसी का काला था, किसी का गुलाबी, कोई भी लौड़ा 8 इंच से कम तो था ही नहीं, बल्कि असल में ये 5 लौड़े पौने नौ इंच लंबे हो गए थे और उठे हुए ऐंठ रहे थे। अंडकोश भारी-भारी  थे और झूल रहे थे। झांटें किसी की थी,किसी की नहीं।संजना रानी ने सब देखा।

चंपाबाई ने मधुप्रिया की टांगों को चौड़ा किया ताकि जालिमसिंह या रक्तसिंह उसके चूत के मांस में अंगुली या अंगूठा डाल झँझोड़ सके।लेकिन पांचों ने एक साथ झपट्टा मारा और सब मिलकर कोई उसकी गांड में तो कोई उसकी फुद्दी में अंगुल, हाथ, अंगूठा घुस्स घुसाने लगे।  लेकिन यह पर्याप्त नहीं था, इससे उन्हें कुछ खास हासिल नहीं होने को था जब तक कि नंगी छोकरी की गांड और चूत में लोहे का कठोर काला डंडा ठोंका नहीं जाए, आह! उसमें ही असल मर्द को मज़ा आता है। नव ब्याहता कन्या के नाजुक गुप्तांगो में यह डंडा ये लोग घुसा कर ही माने। पहले तो इस छोकरी रानी की ठुकाई हुई, ठक, ठक, ठोंक-पोंक, ठकाक -ठकाक, ठट्ठ -लट्ठ ! फिर बुरी तरह से — मधुप्रिया को ऐसा लग रहा था जैसे उसके कमसिन शरीर पर शिकारी कुत्ते या भेड़िये चढ़े हुये हों। और चढ़े भी– उनमें कोई गैंडा था तो कोई सांड, कोई भालू था तो कोई रीछ, ओफ्फ़, ओफ्फ़–, सब पांचों हंस रहे थे और बालिका वधू को मज़ा मार-मार ‘चोद’ रहे थे।

इतना क्या! इतना ही क्यों? अगर दो लं ड एकसाथ  उसकी भोसड़ी में घुसेंगे तो दो लंड एकवक्त में उसके मुंह व हलक में भी घुसेंगे , और एक लंड साली की गांड के छेद में!नव ब्याहता का तो कस और निचोड़ कर मज़ा लेना है तो लेना है और इन पाँच ने तो कसम से लिया।

जब पहली पारी में ये पांचों महापुरुष झड़ कर संतुष्ट हो गए तो दूसरी पारी का घिनौना खेल शुरू करने की  ललकार लगी।

इस दूसरी छोरी का नाम कुमकुम था, उम्र सिर्फ 16 साल। स्कर्ट आर टॉप्स-टाई में सजी -धजी इस बालिका का चेहरा बिलकुल मासूम और प्यारा-प्यारा था। गाल फूले-फूले, कमर पतली, बेल्ट दार । गोरी चटक पिंडलियाँ दिख रही थी, टखने मजेदार । मम्मों का उभार भारी था, उम्र बहुत कम मगर मम्मे उसकी उम्र से बड़े-बड़े जिसमें से चूँची की नोंक तक दिख रही ।

सभी मर्द बिलकुल बुरी तरह से भद्दे और नंगे थे, और उनके सामने यह कबूतरी थी, आह , क्या चीज़ थी, चकली जांघें, चूत के त्रिकोण पर कोमल-कोमल, हल्के-हल्के, चिकने-चिकने बाल। भोलाभाला मुखड़ा !!!

लेकिन, नहीं! जालिमसिंह , रक्तसिंह , मोटाराम जाट और दो भयंकर दाढ़ीदार पठान इस बालिका के नितम्बों की उठान और गठान देख कर इस कन्या का मांस मरोड़ने, दबोचने और नोंच -नोंच कर कुत्सित मज़ा लेने अश्लीलता पूर्वक आगे आ गए। चंपाबाई ने कुमकुम को मुंह के बल जालिमसिंह की गोद में गिराया जहां उसने अपना उठा हुआ लंद जबर्दस्ती उसके मुंह में ठेल दिया, पीछे से संजना ने लड़की का स्कर्ट खोल उसकी पेंटी उतारी , और इसी के साथ पूरे पाँच हाथों की अंगुलियाँ बिच्छू की तरह कुमकुम की कोमल-कमसिन गांड पर रेंगने लगी। वे उसकी गांड के गोलक हर ओर से तोड़ने मरोड़ने  लगे; दो पठानों ने मज़ा ले-ले उसकी गांड का छेद चौड़ा किया। और इसके बाद ???????????????  !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!

रक्तसिंह ने ज़ोर-ज़ोर से उस कन्या की  कोमल गुदाज गांड पर घूंसे और मुक्के बरसाने  शुरू कर दिये, यही नहीं मोटाराम जाट कस कर तड़ातड़ तड़तड़ उस की मधुर गांड पर कोड़े बरसाने लगा, हे भगवान!!! हाय राम!!! उफ-उफ !!! फिर तो हर कोई उस पर पिल पड़ा और टूट पड़ा। उसकी गांड थी भी चौड़ी -चकली, गोल-गोल और कसी-कसी ! जैसे-जैसे वह आह-आह करती जाती कौड़े और हंटर का क्रियाकर्म बढ़ता जाता। फिर कुमकुम को पीठ के बल लिटाया और जालिमसिंह ने बड़ी बेशर्मी से लड़की के  सुंदर मुंह व ओठों पर अपनी पूरी की  पूरी भारीभरकम गांड टिका दी, गांड का छेद लड़की की जीभ तले आ गया था और क्योंकि हुकुम हुआ था तो उसे वह छेद,  गांड का छेद चाटना पड़ गया।  रक्तसिंह को जोश आ गया तो वह उसके मुंह पर चढ़ कर उसके मुंह में अपना लौड़ा घुसा दिया; तीन लोग उसकी चूत को बजा रहे  थे। साथ-साथ पिटाई भी हो रही थी। चूत , गांड, और मुंह में एक के बाद एक कोई 27 बार सबके मोटे-मोटे लौड़े घुसे और अब उसे आलपिनों की नोंक चुभा-चुभा कर भी पीड़ा और दर्द दिया जाने लगा, और फिर डंडा भी घुस रहा था। पांचों कामपिशाच बन गए थे और उसे मांस के लोथड़े की  तरह रौंदे और नोंचे जा रहे थे। दर्द से उसकी आँखों से  आँसू निकल आए, एकाध जगह खून भी, पर ज़ालिमों ने उसे तभी छोड़ा जब वह थक कर बेहोश हो गई ।

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