Jaadui Anguthi – Dirty Sex Tales

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हैल्लो दोस्तों,

आज मैं एक काल्पनिक कहानी लिखने जा रहा हूँ जिसका असल ज़िन्दगी से कोई वास्ता नहीं है…

तो कहानी शुरू होती है एक हवेली से..

भीड़ भाड़ भरे शहर से बाहर एकांत में एक हवेली बनी हुई है जो काफी सालों से बंद पड़ी है.. कहते है कि उस हवेली के ठाकुर साहब बहुत रंगीन मिज़ाज़ के थे इसलिए उन्होंने 5 शादियां कि थी..

पाँचों ठकुराइन कि मौत सम्भोग के दौरान हुई थी.. क्यों कि ठाकुर साहब का लिंग भी इतना मोटा हुआ करता था कि वो बहुत कोशिश करते लिंग को ठकुराइन कि योनि में डालने कि लेकिन वो अंदर नहीं जा पाता..

फिर ठाकुर साहब जोर जबरदस्ती करके अपना मोटा लिंग ठकुराइन कि योनि में गुसा देते और दर्द के मारे ठकुराइन कि मौत हो जाती क्यों कि उनसे दर्द सहन नहीं हुआ..

इसी वजह से ठाकुर अपनी ज़िन्दगी में कभी औरत कि योनि का सुख नहीं ले सके और एक समय आया जब वो खुद बुढ़ापे कि दहलीज पर आ पहुंचे..

बुढ़ापे मैं भी उनका लिंग तना हुआ ही रहता.. और वो वैश्याओं को हवेली बुला कर उनकी योनि भोगने कि कोशिश करते परन्तु लिंग अंदर घुसते ही औरत कि दर्द से मौत हो जाती..

ठाकुर ने कई डॉक्टर को अपनी परेशानी बताई, कई हकीमो से जाड फूँक तक करवाया लेकिन कोई असर नहीं दिख रहा था..

एक दिन उन्होंने एक तांत्रिक को हवेली बुला कर तंत्र विद्या के सहारे अपनी परेशानी का निवारण करना चाहा.. लेकिन ये भी ठाकुर साहब पर उल्टा पड़ गया.. गलत मन्त्रों कि वजह से धीरे धीरे ठाकुर साहब अदृश्य हो गए….

ठाकुर साहब को सिर्फ अपने लिंग को आम इंसान जैसा करना था ताकि वो औरत कि योनि का सुख ले सके परन्तु अब ठाकुर साहब अदृश्य हो गए.. इससे ठाकुर को बाहर गहरा आघात पहुंचा और वो तांत्रिक पर बहुत क्रोधित भी हुए…

उन्होंने तांत्रिक के सामने कहा कि ये हवेली ही मेरे लिए मनहूस है..

मेरे पैदा होते ही मेरी माँ कि मृत्यु हो गई, माँ के शोक में पिताजी भी बीमार पड़ गए और कुछ ही महीनो में चल बसे..

मेरी पत्नियां भी ज्यादा दिन इस हवेली में नहीं रह सकी.. ना मुझे कोई औलाद हुई है..

इस हवेली ने मुझे अकेला और बेबस कर दिया है..

तांत्रिक को सिर्फ ठाकुर कि आवाज सुनाई दे रही थी… जिससे अब तांत्रिक थोड़ा घबराने लगा..

और वो उठ कर दरवाजे कि तरफ भागा, और हवेली से बाहर भाग गया..

ठाकुर हवेली कि दीवारों से बात करते हुए हवेली को श्राप देता है कि मेरे मरने के बाद जो भी इस हवेली मैं आएगा वो मौत के घाट उतर जाएगा..

ठाकुर कि ऊँगली में एक हरे नगीने वाली अंगूठी थी जो तांत्रिक ने मंत्रोच्चारण करने से पहले ठाकुर को दी थी..

ठाकुर ने श्राप देते हुए कहा कि इस हवेली में आने वाला हर शख्स मर जाएगा.. और अगर मरने से पहले कोई शख्स मेरी अंगूठी को अपनी उंगली में पहन लेगा तो वो मेरी तरह अदृश्य हो जाएगा और उसकी मौत टल जाएगी..

ठाकुर अदृश्य होकर हवेली में अकेला भटकने लगा… सभी को लगता कि ठाकुर मर चूका है और उसकी आत्मा हवेली में घूमती रहती है इसलिए कोई भी हवेली के नज़दीक नहीं भटकता..

कुछ ही दिनों में ठाकुर कि मौत हो गई.. और हवेली पूरी तरह से वीरान हो गई..

कोई भुला भटका अगर उस हवेली में चला भी जाता तो ठाकुर के श्राप कि वजह से उसकी मौत हो जाती..

तो ये था हवेली का इतिहास, और इस बात को 200 साल बीत चुके है..

अभी कुछ दिन पहले मैं किसी काम के सिलसिले से शहर से बाहर जा रहा था..

मैं जिस रस्ते पर जा रहा था वो रास्ता एक कच्ची सड़क थी जिस वजह से मैं धीमे धीमे गाडी चला रहा था.. तभी अचानक तेज बारिश शुरू हुई और कच्ची सड़क पर पानी भर गया..

मुझे दूसरा रास्ता लेना पड़ा..

दूसरा रास्ता जंगल से होता हुआ जा रहा था जहां एक भी लाइट नहीं थी, काफी डरावना लग रहा था..

मैं भी डरने लग गया और मैंने सोच लिया कि जहां भी घर या कोई ठहरने जैसी जगह दिखाई देगी, मैं वही रुक जाऊँगा..

तभी कुछ कि आगे जाकर मेरी नज़र उस हवेली पर पड़ी..

मैं अपनी कार को सीधा उस हवेली के अंदर ले गया..

हवेली का दरवाजा भी खुला हुआ ही था, तो मुझे अंदर कोई होगा..

मैं अंदर गया और काफी आवाजें दी लेकिन किसी का कोई जवाब नहीं आया……

मैं बहुत डर रहा था और मेरी आँखों के सामने अँधेरा छाया हुआ था, तभी मेरी सांस बंद होने लगी और मैं बेहोश होने लगा.. और मैं ज़मीन पर गिर पड़ा..

शायद ये ठाकुर के श्राप कि वजह से हो रहा था, मेरी जान जाने वाली थी..

तभी मुझे सपना आने लगा और सपने मैं मुझे एक बूढ़ा आदमी दिखाई दिया जिसने बड़ी बड़ी मूंछे रखी हुई थी और कपड़ों के ढंग से लगता था कि वो किसी राजघराने का व्यक्ति हो..

वो किसी महाराज कि तरह मेरे सामने सिंहासन पर बैठा था और मैं उसके बगल में खड़ा था..

कमरे मैं हलकी हलकी रौशनी थी जिससे उस व्यक्ति का चेहरा साफ़ दिखाई दे रहा था और एक तेज हरे रंग कि रौशनी भी चमक रही थी..

जब मेरी नज़रों ने उस रौशनी का पीछा किया तब मुझे पता चला कि वो रौशनी उस व्यक्ति कि अंगूठी में लगे हीरे से आ रही थी..

उस व्यक्ति ने अपनी अंगूठी निकाल कर मुझे दी और देखते देखते वो अदृश्य हो गया..

मैं जैसे ही पीछे मुड़ा तो मेरी नज़र एक शीशे पर पड़ी और शीशे में मैंने अपने आप को देखा तो देखते ही देखते मेरे चेहरे पर दाढ़ी और मूंछ बढ़ने लगे.. तब मैंने गौर किया कि मेरी शकल दाढ़ी मूंछ आने पर बिलकुल उस व्यक्ति जैसी लग रही थी.. और फिर मैं आँखे बंद करके कुछ सोचने लगा और मेरे सामने ठाकुर साहब कि ज़िन्दगी के कुछ दृश्य किसी फिल्म कि तरह चलने लगे और मैं ठाकुर के बारे में बहुत कुछ जान गया…

तभी खिड़की से तेज सूरज कि रौशनी आई और मेरे चेहरे पर गिरी जिससे मुझे होश आ गया.. अब तक सुबह हो चुकी थी….

होश आने पर जब मैंने अपनी मुट्ठी खोली तो में देख कर हैरान हो गया.. मेरी मुट्ठी में उस व्यक्ति कि दी हुई अंगूठी थी जो उसने मुझे सपने में दी थी लेकिन ऐसा कैसे संभव है ? ये सवाल मेरे दिमाग में घोड़े कि तरह दौड़ने लगा…

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मैं उठ कर बैठ गया और सपने वाली बातों को याद करने लगा और फिर हवेली में एक चक्कर लगाने का मानस बनाया..

मैंने उस अंगूठी को अपनी जेब में रख कर हवेली के एक कमरे में प्रवेश किया.. सामने एक बड़ी सी तस्वीर लगी थी जिस पर बहुत धूल जमी थी.

मैंने उस धुल को साफ़ किया तो मेरा दिमाग ये देखकर सुन्न हो गया कि वो तस्वीर मेरी थी या मेरे जैसे दिखने वाले किसी इंसान कि थी.. उस तस्वीर के नीचे ठाकुर तेजप्रताप सिंह नाम लिखा था और एक तारीख लिखी थी जो 200 साल पहले कि थी..

उस हवेली का और मुआयना करने पर मुझे पता चला कि वो हवेली मेरी ही है और मैं ही ठाकुर तेजप्रताप सिंह हूँ.. और ये मेरा पुनर्जन्म है..

मैं पूरी कहानी समझ गया.. और फिर मुझे याद आया कि मैं घर से किसी काम के सिलसिले में निकला था जो अभी भी बाकि है..

मैं फटाफट हवेली से बाहर आया और अपनी कार से वहां पहुंचा जहां मुझे काम था…

मैंने वो काम निपटाया और फिर से घर चला गया…

घर पहुंचते पहुँचते शाम हो गई… और मुझे काफी थकान भी हो गई थी, तो बिस्तर पर पड़ते ही नींद आ गई…

अगले दिन सुबह नींद खुली, सुबह का सारा काम निपटाया… फिर मुझे उस अंगूठी के बारे में याद आया..

मैंने अपनी पैंट कि जेब से अंगूठी निकाली और उसे उंगली में पहन ली और दूसरे काम करने लगा..

कुछ देर बाद जो देखा उससे मेरे होश उड़ गए… मैं शीशे के सामने गया तो मुझे उस शीशे में अपना प्रतिबिम्ब नहीं दिखा.

मैंने अपनी आँखे मसल कर फिर से देखा तो भी मेरा प्रतिबिम्ब मुझे शीशे में नहीं दिखा..

मुझे चिंता होने लगी कि मेरे साथ ये क्या हो रहा है, कहीं कोई बीमारी तो नहीं है…

फिर मेरा ध्यान अंगूठी पर गया और मैंने अंगूठी को उंगली से निकाल दी, और तभी में अपने आप को शीशे में देख पाया…

मैंने फिर वो अंगूठी पहनी तो फिर से में शीशे से गायब हो गया.. तब मुझे समझ आया कि ये अंगूठी कोई जादुई या चमत्कारी अंगूठी है… जब तक मेरी ऊँगली में है मैं गायब रहूँगा और अंगूठी के खुलते ही वापस अपने पूर्ण रूप में आ जाऊँगा..

मैंने वो अंगूठी पहनी और गायब होकर मैं घर से बाहर चला गया…. और मैंने ये नोटिस किया कि कोई भी मुझे नोटिस नहीं कर रहा… तो मुझे यकीन हो गया कि में सच में गायब हो सकता हूँ..

मैं वापस घर मैं चला गया….

घर में घुसते ही मैंने देखा कि मेरी छोटी बहन रानू अपने कपडे लेकर बाथरूम कि तरफ जा रही थी… तो मैं भी उसके साथ चल दिया.. और उसके साथ बाथरूम में घुस गया और एक कोने में जाकर खड़ा हो गया..

रानू दिखने मैं काफी खूबसूरत है, हाल ही में जवान हुई है, उसके स्तन उसकी उम्र से ज्यादा सुडौल और बड़े है, उसकी गांड भी काफी गदराई हुई है…

मेरी सगी बहन है फिर भी उसका फिगर देख कर मेरा लंड तन जाता है और कई बार उसके नाम कि मुठ भी मार चूका हूँ.. मेरी तमन्ना थी कि उसके नंगे शरीर को देख सकूँ…

इसलिए मैं अभी अभी मिली शक्ति का उपयोग करके कुछ करने के मूड से रानू के साथ बाथरूम में घुस गया..

रानू ने सलवार कमीज पहनी थी…

उसने बाथरूम में जाते ही अपने कपडे टांग दिए.. फिर अपना कुर्ता और ब्रा उतार कर अपने बदन पर पानी डालने लगी..

उफ्फ आज पहली बार रानू के बोबे मेरे सामने थे और वो भी नंगे… उसको देखकर मेरा लंड तन कर खड़ा हो गया…

रानू ने अपने पेट गर्दन हाथ और कन्धों पर साबुन लगाया और फिर हाथ से मलने लगी और मलते मलते वो अपने बूब्स को मलने लगी.. उसके बूब्स पर झाग लगा था जिसमे से उसके गहरे भूरे रंग के निप्पल बहुत कि आकर्षक लग रहे थे…

मैंने जितना सोचा था उससे भी कई ज्यादा खूबसूरत है मेरी बहन…

रानू के सलवार का रंग सफ़ेद था और गीला होने कि वजह से वो उसकी जाँघों और पैरो पर चिपक गया था..

अंदर उसने नीले रंग कि पैंटी पहनी थी जो साफ़ साफ़ दिखाई दे रही थी..

फिर रानू ने सलवार का नाडा खोल कर सलवार को भी अपने शरीर से अलग कर दिया और अगले ही मिनट पैंटी भी उसके तन से अलग हो चुकी थी…

रानू मेरे सामने एक दम नंगी खड़ी थी.. मुझे विश्वास नहीं हो रहा था कि मैं मेरी सगी बहन को इस तरह सामने से नंगी देख पाउँगा..

रानू कि जांघों के बीच बारीक़ बालो से गिरी एक खूबसूरत सी चुत है जिसके बाल पानी से भीगे हुए थे और चुत कि दोनों फांके आपस में चिपकी हुई है और उसके बिच एक पतली सी दरार…..

मन कर रहा था कि वही पटक कर चोद दूँ रानू को..

बेचारी ने अब तक चुत में ऊँगली भी डाली या नहीं, लेकिन देख कर तो यही लगता है कि अब तक कुंवारी है….. किसी से चुदवाई नहीं है…

उसने अपने निचले हिस्सों पर साबुन लगा दिया और फिर हाथ से मलने लगी और फिर अपनी चुत पर भी मलने लगी…

उसको अपनी चुत सहलाते देख मेरा लंड पैंट में ही तड़पने लगा और रानू कि चुत लेने को आतुर हो गया..

मैंने अपना लंड बाहर निकाला और मुठ मारना शुरू कर दिया…

मैं रानू के एक दम नज़दीक चला गया और अपना लंड उसकी चुत के बिलकुल पास ले गया और मुठ मारने लगा… और रानू अपना काम करती रही..

कुछ ही देर में वो नहा कर अपने कपडे पहनने लगी… और कपडे पहन कर बाहर आ गई..

फिर मैं भी अपने रूम में चला गया और अंगूठी खोल कर अपने पूर्ण रूप में आ गया..

उस दिन के बाद मैं रोज ही रानू को नहाते हुए देखता और उसकी चुत को देखकर मुठ मारता,,, मैं नहीं चाहता था कि मेरा ये राज़ बाहर आए इसलिए मैं अपने आप पर कण्ट्रोल करता…..

To be continue

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